lekhan vani

lekhan wah hota hai jisme takat hoti hai aur chetna jagti hai lekhak ke man me jo vichaar aata hai wah wahi likhta hai

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ajay kumar pandey


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कविता नटवरलाल केजरीवाल

Posted On: 24 Jan, 2014  
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आसाराम सब पर हैं मेहरबान

Posted On: 29 Aug, 2013  
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तनाव क्यों और कैसे कम करें

Posted On: 8 Apr, 2013  
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बात एक हाथ की

Posted On: 28 Mar, 2013  
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रिटेल में विदेशी निवेश को लाना कहाँ तक सही

Posted On: 5 Dec, 2012  
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क्या कम उम्र में लड़की की शादी ठीक है

Posted On: 20 Nov, 2012  
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दीपावली की शुभकामनाएं

Posted On: 9 Nov, 2012  
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मीडिया में भ्रष्टाचार कहाँ तक सही

Posted On: 1 Nov, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रिय अजय जी, सादर ! बहुत ही विचारणीय और सलीके से आपने एक गंभीर विषय को रखा है! यह कहाँ गलत न होगा की हर ब्यक्ति आज तनाव ग्रस्त है. आपने तनाव कम करने के उपाय भी सुझाये हैं, जो अपनाने योग्य है! थोड़ी देर भी हम योग और ध्यान करें तो तनाव दूर अवश्य होगा! दूसरा अपने कार्यालय के काम को एन्जॉय करते हुए करें प्रतियोगिता में स्पर्धा होनी चाहिए, इर्ष्या या जलन नहीं. सबसे बड़ी बात --- होइहैं वही जो राम रची राखा और कर्मण्ये वा अधिकारस्ते की भावना से काम करना चाहिए ... बस नहीं तो दवाइयां भी उपलब्ध है, अंगरेजी आयुर्वेदिक या फिर होमोयोपैथी ... हाँ तनाव के वजह से बुरे ख्याल जैसे आत्महत्या जैसा ख्याल मन में कभी न लावें क्योंकि आजकल युवावर्ग में आत्महत्यायों के भी आंकडे कुछ कह जाते हैं. अजय जी आपके द्वारा महत्वपूर्ण और ज्वलंत विषय पर विचार रखने के लिए धन्यवाद!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

वह दिन दूर नहीं जब तनाव हमारे देश की प्रगति रोक देगा और हमारे युवा और कर्मचारी मरने लगेंगे सरकार चिंता तो जता देती है पर इन कथनों को नहीं देखती है यह कथन एक मनोवैज्ञानिक ने अपने शोधपत्र में भी दिया था इसमें उसने तनाव पर शोध किया था और फिर इसे अपनी पुस्तक में दिया था तनाव पर आकडे चौका देने वाले हैं अगर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो इससे हमारे देश की प्रगति तो रूकेगी ही साथ ही इससे हमारे युवाओं की भी मौतें होंगी ओर येही तनाव हमारे देश में युवाओं की मौत का कारण बनेगा सरकार को चाहिए की इस पर ध्यान दे ओर इसको कम करने के लिए अपने अस्पतालों में मनोवैज्ञानिक बातचीत के कार्यक्रम चलाये इससे तनाव को रोकने में मदद मिलेगी युवाओं को भी चाहिए की कोई भी काम को फिकर से करें और तनाव को हावी न होने दें और हमारे ऋषियों और आयुर्वेद द्वारा दी गयी क्रियाओं और चिकित्सों का लाभ उठाएं इसी से तनाव कम होगा और देश की प्रगति भी होगी और युवाओं की मौतें भी नहीं होंगी और यह बीमारियाँ पूरी तरह ख़त्म हो जायेंगी और देश के युवा निरोग रहेंगे और तनाव भी ख़त्म हो जाएगा बस जरुरत है तो सरकार और युवाओं को मिलकर तनाव रोकने की ! आपने बहुत विस्तृत और सटीक रूप से तनाव बढाने के कारकों पर द्रष्टि डाली है और सही लेखन भी दिया है ! लेकिन मित्रवर , आज का समय ऐसा है की जो तनाव में रहकर सही निर्णय ले पाटा है वाही सफल और सार्थक और योग्य माना जाता है ! बेहतरीन पोस्ट !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

इससे बढ़िया तो उसके लिए सीधे मौत की सजा का फैसला करे ताकि दूसरा बलात्कारी बलात्कार करने से पहले दस बार सोचे और सरकार ने जो कानून बनवाए हैं क्या उनपर अमल क्यों नहीं हो रहा बलात्कार को रोकने के लिए कई कानून बने उनमे से कुछ कानून में बताना चाहता हूँ sexual harassment act ipc 454 और इंडियन रेपिस्ट एक्ट पर इन कानूनों पर कितना अमल हो रहा है हमें तो कोई अमल होता नहीं दिख रहा है यह कानून केवल कागजों में ही नहीं रहना चाहिए बल्कि इन पर अमल किया जाना चाहिए में कुछ सवाल सरकार से पूछना चाहता हूँ क्या दिल्ली का आपराधिक राजधानी होने का कलंक हटेगा क्या पुलिस सुधरेगी क्या न्याय प्रणाली सुधरेगी क्या कानूनों पर अमल होगा इन सवालों पर दिल्ली सरकार को सोच लेना चाहिए और दिल्ली के उप्पर से आपराधिक राजधानी होने का कलंक हटाने का प्रयास करना चाहिए वरना वह दिन दूर नहीं जब दिल्ली में अपराध होंगे और दिल्ली आपराधिक राजधानी की सूचि में होगी सरकार को अब भी दिल्ली को आपराधिक राजधानी के धब्बे को हटा देना चाहिए मित्रवर अजय कुमार पाण्डेय जी , आपने बहुत सटीक लिखा है ! और आपकी उम्र के हिसाब से ऐसा लेखन आपकी बुद्धिमत्ता को दिखाता है ! मित्र फांसी की सजा , जैसा आपने लिखा है बिलकुल होनी चाहिए किन्तु वो परिस्थति देखकर ! दिल्ली में जो कुछ हुआ उसमें फांसी की सजा भी कम है किन्तु आगे से फिर बलात्कारी पीडिता को मार ही डालेंगे इस डर से की कहीं ये सब बता न दे ! इसलिए बहुत कुछ सोच समझकर ही सरकार को फैसला लेना पड़ेगा !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

अजय कुमार पाण्डेय जी यह सब इतना आसान भी नहीं है कि धोया भिगोया और हो गया. देश का आतंरिक रक्षा तन्त्र पूरी तरह सड़ चुका है. आवश्यकता इसके आमूलचूल परिवर्तन की है और यह कोई आसान कार्य नहीं है.मगर आज यदि इस दिशा में विचार किया जाए तो आने वाले कुछ वर्षों बाद देश में महिलाएं खुद को  हरवक्त सुरक्षित समझ सकेंगी. आज पुलिस पर खुद पुलिस वाला ही भरोसा नहीं करता.न्याय तन्त्र इतना लचर है कि वहाँ न्याय कम तारीखें ही ज्यादा मिलती हैं.छोटी अदालतों के न्यायाधीशों कि विश्वसनीयता पर सवाल उठना आम बात हो चुकी है. इसके पीछे एक कारण और भी है जो परोक्ष रुप से जिम्मेदार है वह आसानी से बैंको से कर्ज मिल जाना भी है. यह एक विस्तृत विषय है किन्तु यहाँ इतना जानना ही काफी है कि बैंक से मिले कर्ज का दुरुपयोग हो रहा है.इसमे वाहन के लिए कर्ज और व्यक्तिगत कर्ज की बड़ी भूमिका है. बहरहाल आपने बहुत अच्छा लिखा है अच्छी सकारात्मक सोच दिखायी है. यह अच्छी बात है.

के द्वारा: akraktale akraktale

मित्र अजय कुमार पाण्डेय , आपके विचारों से सहमत होने में असमर्थ हूँ ! आप बाल विवाह के पक्ष में कैसे हो सकते हैं. जब तक लड़का-लड़की पूर्ण शारारिक और मानसिक रूप से तैयार न हो जाये तो शादी कैसे करनी चाहिए. और क्या जिम्मेदारी है कि शादी के बाद लड़के-लड़कियां बिगडेंगे नहीं. आये दिन समाचारपत्रों में पढ़ते हैं “प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या”, “प्रेमिका के लिए पत्नी को तलाक” …. वास्तव में शादी की कोई उम्र नहीं होती जब दोनों पूर्ण रूप से अपनी जिम्मेदारी निभाने लायक हो जाये तब शादी करनी चाहिए.अभी शायद आप समाज की सच्छी और गुण दोष से वाकिफ नहीं हैं ! क्षमा चाहूँगा , सहमती में सर नहीं हिला सकता हूँ इस विषय पर

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

अशोक सर की बातों से शत प्रतिशत सहमत............................. परन्तु ऐसे कृत्य सिर्फ किसी व्यवस्था विशेष ( प्रशासन) से ही नहीं बल्कि पूरी समाज में आये दिन घटित होते रहते हैं................आज जरुरत है मानसिक और बौद्धिक विकास की जिसका दिन प्रतिदिन लोप होता जा रहा..................और अनुज अजय जी ........आप जिस वीरता की बात कह रहे हैं ....उसे अपने आस-पास के दस व्यक्तियों के सामने रखिये फिर देखिये वो इसे वीरता कहते है या फिर कायरता..............भाई साहब....आज मानव का मानसिक और बौद्धिक स्तर किस स्तर गिर गया है अभी आपको अंदाजा नहीं है......धीरे-धीरे समय के साथ आप भी परिचित होते जायेंगे........और यह तभी संभव है जब आप मान-सम्मान और प्रतिष्ठा से ऊपर उठकर मानव बनकर सोच पाएंगे..................फिलहाल दूर-दूर तक इसकी कोई संभावना नहीं दिखती क्योंकि आपके अन्दर बहुत बचपना है या फिर जूनून है खुद को विख्यात करने की...............आप अभी १४-१५ वर्ष के है और स्वयम को समाज सेवक से संबोधित करते हैं जो की हास्यप्रद है.........अपने अन्दर Muturity लायें.................आमीन............! यदि यहाँ वास्तव में वीरता का सम्मान होता तो कोई वीर इस तरह सडकों पर कुत्तों की मौत नहीं मरता....................फिर मरने के बाद वीरता सम्मान से सम्मानित करना सच में एक बेईमानी होगी और मानवता का मजाक..........................

के द्वारा: अन्जानी- अनिल अन्जानी- अनिल

यदि आपने स्वयम लिखी है तो बस इतना ही कहूँगा कि कमाल की रचना है जवाब नहीं आपने अपने उम्र से आगे निकलकर अभिव्यक्ति की है. कोई भी व्यक्ति हो इसे पढ़ने के बाद प्रशंसा करना नहीं भूलेगा. एक काम करिए आप अपने आस-पास के स्थानीय पेपरों में एक कॉपी भेज दीजिये. यदि साहित्य का सम्मान इस भारत भूमि पर थोडा भी रह गया होगा तो निश्चय ही आपकी यह रचना कहीं न कहीं छपेगी. साथ में महा महिम आदरणीया, साहित्य की महा जानकर, तमन्ना जी जिनका आलेख अक्सर दैनिक जागरण में प्रकाशित होता रहता है, के ब्लॉग पर इसका एक लिंक दे दीजिये और उनसे पूछिये कि क्या अब मेरी यह रचना दैनिक जागरण में प्रकाशित होने योग्य है.क्योंकि उनके किसी कमेन्ट में पढ़ा था कि आपके साहित्य में वो अभी बात नहीं जो होने चाहिए इसलिए नहीं छपता. मेरी समझ से तो आप अपनी इस रचना से उनसे बहुत आगे निकल गए हैं अतः आपकी रचना प्रकाशित ही होनी चाहिए. और उनसे यह पूछ लीजियेगा कि यदि गुणवत्ता और महत्ता को प्रकाशित नहीं किया जाता तो कहा और कैसे चापलूसी करनी पड़ेगी, यह जरुर बताएं..................मैं तो इतना ही कहूँगा कि ........साहित्य और सेवा.............अब तो एक धंधा हो गया है................पर गन्दा है यह................!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी, ‘अपनी डफली अपना राग’ ………..मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है………. अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा……अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा…….आत्मवान व्यक्ति respond करता है…..तीन दिन बाद react नहीं……..और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो….मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको……चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का….. इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है…..आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है….. इस सब के आलवे……न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है……..स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है……हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है…….और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो…… “इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…” जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है……ये किसी और लोक की बात नहीं है……….. आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें….की बिना रावण के राम का होना असंभव है…….आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं……ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए…….जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा………. ” इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ” क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा…..अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल……….और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है………..तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है………..क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा……..मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है………ये भिखमंगापन त्यागिए………! और अंत मे यही कहूँगा….कि , ’जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा….. और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है…………मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा………” (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो…….मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है………) एक और बात ज़रा मुझे बताइए….जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी……? व्यक्ति का अस्तित्व होता है…समाज का नहीं…..मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे……????

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

के द्वारा: sinsera sinsera

श्री पाण्डेय जी मुझे ज्ञात था आप.चिढेगें. किन्तु कोई बात नहीं. वैसे मै पहले ही बता दूँ, मै बहुत बड़ा ज्ञानी नहीं किन्तु जितना भी मैंने सीखा है, वह पूर्ण एवं पर्याप्त है. जो भी हो, मेरे ज्ञान को आप क्या कसौटी पर परखेगें? मै अज्ञ तों नहीं अल्पज्ञ अवश्य हो सकता हूँ. और यदि इस शास्त्रार्थ से जन साधारण को लाभ पहुँचने क़ी उम्मीद है तों आप क़ी यह चुनौती मुझे स्वीकार है. पुनश्च, यदि तार्किक, प्रामाणिक एवं आवश्यक तथ्य स्पष्ट करने क़ी हिम्मत चाहिए तों मेरे अन्दर वह हिम्मत है. किन्तु यदि इस मंच के माध्यम से लोक प्रियता हासिल करना मुद्दा है, तों क्षमा कीजिएगा, शायद इस प्रतियोगिता के प्रथम चरण में ही मै हार गया हूँ. अस्तु, थोड़ा सा ध्यान दें- (१)- जन्मना जायते शूद्रो संसकारेण द्विजोत्तम. वेद पाठी ब्रह्म चारी ब्रह्म जानातीति ब्रह्मणः. इस प्रकार मनुष्य को उनके आचार व्यवहार के आधार पर चतुर्वर्णों में विभक्त किया गया है. (२)- अब ज़रा निम्न वेद वाक्य पर ध्यान दें- ब्राह्मणों अस्य मुखमासीद बाहू राजन्यः कृतः. उरू तदस्य यद्वैस्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत. अर्थात प्राकृत पुरुष के मुख का अवलम्बन ब्राह्मण को, बाहू का क्षत्रिय को, वस्ति प्रदेश का वैश्य को तथा चरणों का अवलम्बन शूद्र को प्राप्त हुआ. (३)- अब ज़रा यजुर्वेद क़ी निम्न ऋचा पर ध्यान दें- याजन्य तदासीद दीर्घ पादम लघु च विन्यास नः वभूव. वीतं आजान्वनाकम सूत्रमीति अभिधीयते. अर्थात यज्ञादि कार्य को दीर्घ तपादि कार्य को लघु, विन्यास कार्य को मध्य तथा अभिज्ञानादि कार्य को निम्न वीत सूत्र यथेष्ट है. पाण्डेय जी, मुझे विश्वास है आप लघु तथा दीर्घ आदि संज्ञा से भली भांति परिचित होगें. क्योकि जैसा कि आप के इस लेख पर विविध प्रतिक्रियाएं मिली है, मुझे लग रहा है, आप का यह संस्कार शीघ्र ही हुआ है, अतः आप इस दीर्घ आदि संज्ञा से अवश्य ही परिचित होगें.

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

आदरणीय पाण्डेय जी, मुझे मालूम है मेरी यह प्रतिक्रिया आप को फूटी आँख नहीं सुहाएगी. लेकिन अपनी आदत से मज़बूर होने के कारण उन्माद पूर्ण प्रलाप के प्रक्षेपण के लोभ को संवृत्त न कर पाते हुए कुछ लिख ही रहा हूँ. एक संस्कारी हिन्दू के जीवन में सोलह नहीं बल्कि अड़तालीस संस्कार होते है जो पुंसवन से लेकर अंत्येष्टि तक पूर्ण होते है. दूसरी बात यह कि यज्ञोपवीत में सात नहीं अपितु तीन धागे होते है. "त्रयो देवास्त्रयो वेदास्त्रयो लोकास्त्रयो अग्नयः. त्रिताप समाहरणाय त्रिसूत्रमुपवितमस्तु. ये तीन धागे "गोपदरसना" प्रकार से तीन बार परस्पर आवेष्टित होकर 9 धागे बन जाते है. और ये ही धागे नवो ग्रहों का तीनो गुणों से प्रतिनिधिव करते है. गायत्री अर्थात गात (शरीर) हो त्री अर्थात तीन जिसके वह गायत्री है. तीन प्रधान देवो (ब्रह्मा विष्णु एवं महेश) क़ी त्रेधा शक्तियां या गुण (सत, रज एवं तम) जिन तीन सूत्रों (कर्म, भाग्य एवं साक्ष्य या आत्मा) में समाहित होकर उसे त्रिताप (दैहिक, दैविक एवं भौतिक) से त्रिविध (मनसा, वाचा एवं कर्मणा) रक्षा करे वह त्रिसूत्र या उपवीत कहलाता है. और जब यही त्रिसूत्र किसी अनुष्ठान्न के माध्यम से धारण किया जाता है तों उसे यज्ञोपवीत कहा जाता है. "यज्ञोपवीतं परमम् पवीतम प्रजापते र्यत्सहजम पुरस्तात. आयुष्यमग्रम प्रतिमुन्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः. महानुभाव आप ने एक बहुत ही विशिष्ट विन्दु का स्पर्श किया है जो अति आवश्यक है. और आप यदि इन्हें सबके समक्ष रखें तों अवश्य इस विषय पर उठा पटक होगी. और तब इससे कुछ मक्खन क़ी गुन्जाईस बन सकती है. मै तों आप क़ी प्रशंसा ही करूंगा. धन्यवाद

के द्वारा: प्रकाश चन्द्र पाठक प्रकाश चन्द्र पाठक

आदरणीय रक्ताले जी नमन आपने कहा था की रूचि मैडम की खूबियाँ बताऊँ तो उनकी खूबियाँ में यहाँ व्यक्त कर रहा हूँ रूचि मैडम बहुत अच्छी मैडम हैं उनके बारे में कुछ भी कहूँ कम है उन्होंने मेरी मदद निम्न तरह की मेरे को पढाई में राह दिखाई और मुझे हर वक्त अपना मार्गदर्शन दिया आलेख लिखने का रास्ता भी उन्होंने बताया और आज स्कूल में जो भी इज्जत है उनकी वजह से में उनके पाओं छूकर रोज प्रणाम करता हूँ और आज भी प्रणाम किया था उनके पाओं छुकर वह बोली यह तुम क्या कर रहे हो रोज तो प्रणाम करते हो आज नहीं भी किया तो क्या है मैंने कहा मैडम में तो आपका सम्मान कर रहा हूँ और वो भी आप नहीं करने दे रही तो वोह बोली जाओ तुम और लंच करो वैसे भी लंच नहीं करोगे तो पढोगे कैसे तो मैंने कहा पढाई से पहले आपका आशीर्वाद जरुरी है और आपके पैर छुना भी तो मैडम बोली ठीक है अब जाओ और इतने उदगार व्यक्त मत करो रूचि मैडम खुद ही मना करती हैं पर में उनको प्रणाम करके ही स्कूल में अपनी पढाई की शुरुआत करता हूँ आपने मार्गदर्शन किया उसका आभार मेरी हर दिनचर्या रूचि मैडम को प्रणाम करके ही शुरू होती है और रूचि मैडम मेरे दिल में बसती हैं और उनका व्यवहार सभी छात्रों के साथ अच्छा है वह सीधी और संस्कारी मैडम हैं और कभी किसी बच्चे पर हाथ नहीं चलाती में तो उनको अच्छा मानता हूँ और पैर छूकर प्रणाम जरुर करता हूँ और हाँ उन्होंने किसी भी गरीब बच्चे का शिक्षण शुल्क नहीं भरा है क्योंकि वह जो पैसा कमाती हैं वह घर चलाने में ही लग जाता है यह उनके उदगार हैं में उनको जब तक में स्कूल में हूँ तब तक रोज प्रणाम करता रहूँगा और जब निकल जाऊँगा तब भी में उन्हें अच्छा मानता हूँ आपका हार्दिक आभार जो आपने समय निकाला मेरी जो इज्जत स्कूल में है उनकी वजह से है इसलिए भी उनको प्रणाम करता हूँ और करता रहूँगा रूचि मैडम की जैसी शिक्षिका आजीवन मिले येही चाहूँगा वोह मेरे स्कूल में हैं तो पहले प्रार्थना के बाद उनका आशीर्वाद लेकर तब अपनी पढाई स्कूल में शुरू करता हूँ आज भी करा था हार्दिक आभार धन्यवाद

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

अजय भैया जी नमस्कार, भैया आपकी रूचि मेडम में रूचि देखकर लगा था की आपने अपनी कविता में हमें भी कुछ सीखने के लिए रखा होगा किन्तु आपकी रचना में सिर्फ रूचि मेडम बहुत भली हैं और आपकी उन्होंने बहुत मदत की है इससे अधिक कुछ नहीं मिला. मेरी इच्छा है आप पुनः रूचि मेडम पर एक कविता लिखें और बताएं की उन्होंने आपके लिए किस प्रकार की मदत की आपके अतिरिक्त अन्य छात्र छात्राओं से उनका कैसा व्यवहार है.उनमे और क्या योग्यता है.क्या वे समय की पाबन्द हैं, क्या कभी उन्होंने किसी गरीब बच्चे के शिक्षण शुल्क का भुगतान अपने पैसे से किया है.आप अगली रचना में उनकी साड़ी खूबियों के बारे में जरूर बताएं. मन प्रसन्ना रखें और लिखते रहें आप बहुत अच्छा लिखने का प्रयास कर रहे हैं.थोड़ा सा प्रयास और करोगे तो बहुत ही अच्छा लिख पाओगे. आपकी रूचि मेडम को प्रणाम.

के द्वारा: akraktale akraktale

तोशी जी नमन अभी अभी तो आप कह रही थी की जागरण मंच में पक्षपात होता है और अब जब मैंने आपकी प्रतिक्रिया दी तो आप ने मेरी ही बात काट दी इसका अभिप्राय तो यह है की आप कहती है और करती कुछ और हैं यह तो आप भी जानती होंगी की आप ही कह रही थी की कभी कभी अपना हक़ लड़के लेना पड़ता है तो में एक सन्देश रामधारी सिंह दिनकर जी की रचना का लेखन में पक्षपात का देकर बताना चाहता हूँ सुनिए ऐ मेरे साहित्यकारों और कथाकारों मेरे साहित्य का मत उडाओ उपहास पक्षपात का जो करता आलोचना उसका मत करो समर्थन वोही आगे चलकर कर देते बात की काट और लगा देते डाट मत करो समर्थन मुझ नाचीज की लेखन में क्या जगह जब लोग ही ऐसे हो गए जो कर देते बात की काट क्या कहूं मुझ अल्प की जगह नहीं इस दुनिया में ऐ साहित्यकारों उडाओ न उपहास इस कविता के द्वारा तोशी जी आपसे येही अपील करना चाहूं बात को उठाने के बाद काटा न करे आप धन्यवाद अजय पाण्डेय

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

आदरणीय अजय कुमार पाण्डेय जी ! सादर अभिवादन ... देखिये अजय जी जहां तक पक्षपात का सवाल है , तो मैं इस बात का समर्थन नहीं करती की पक्षपात होता है , मुझे तो यहाँ पर हर व्यक्ति से स्नेह प्राप्त हुआ ... मैं नहीं जानती आपका अनुभव कैसा रहा पर मेरा अनुभव बहुत अच्छा है , रही बात किसी के ब्लॉग लिखने की तो महोदय ! यहाँ पर पहले ही कहा जाता है की किसी भी रचना या लेख में अभद्र भाषा का उपयोग न करें ... दूसरे कि किसी ने किसी के बारे में क्या कहा कैसे कहा अगर आपको कुछ गलत लगा तो आप इसकी शिकायत जेजे से कर सकते हैं ... फिर ब्लॉग लिखने की सबकी अपनी स्वतन्त्रता है ...जब ब्लॉग किसी भी चीज कि अच्छाई या बुराई के लिए लिखा गया है तो जाहीर सी बात है उसमें वही सब लिखा होगा वैसे मैंने संतोष भाई का ये लेख अभी पढ़ा नहीं है ... हाँ उनके लेख व्यंग से भर पुर होते हैं यही उनकी खूबी भी है ... उन्होने अपनी स्वतन्त्रता का इस्तेमाल किया और आपने अपनी ... बाकी क्या लिखू आप समझदार हैं

के द्वारा: मनु (tosi) मनु (tosi)

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जरुरत समाज को आगाह करने की है कि हम किस बड़ी समस्या को अपने घर में आने पर मजबूर कर रहे हैं भ्रूण हत्या कर के. ऐसे तो समाज का अस्तित्व ही खतरे में पद जायेगा अगर सिर्फ अपने कुल या वंश को खतरे में देख कर बेटियों का गला घोंटकर बेटों की चाह में ये घ्रणित कार्य जारी रहा.. दहेज़ जैसी कुरीति भी इसका मुख्या कारन है, क्यूँ कि वर्तमान में समाज लोभी और स्वार्थी हो गया है तो वो बेटी की शादी में दहेज़ खर्च नहीं करना चाहता बल्कि दहेज़ लेना चाहता है. ऐसी कुरीतियों को समूल नष्ट कर दिया जाना चाहिए वरना वो दिन दूर नहीं जब लड़कों को शादी के लिए लड़कियां ही नहीं मिलेंगी. आप भी ऐसा प्रयास जारी रखें, मैं भी कोशिश में लगा हूँ.

के द्वारा: gopalkdas gopalkdas

भाई अलीन जी मेरी लेखन शमता सही हो गयी है हाँ में आपके जैसे आलेख लिख तो नहीं सकता लेकिन कोशिश करता हूँ की आपके जैसे आलेख लिख सकू लेकिन हाँ जागरण मंच में जिस तरह से मेने अपने लेखन को नए आयाम देने का निश्चय किया वह सही हो गया लेकिन आपकी प्रतिक्रियाओं से मेरा संबल बढ़ता है आपकी ही प्रतिक्रियाओं से तो मेरा यह लेखन का सफ़र सार्थक हो गया है और आप मेरे भाई हैं तो आप ही मेरा भला बुरा समझते हैं और में भी आपको अपना जैसा समझता हूँ तो मेरे लेखन की शमता आपके आशीर्वाद से ही शुरू होती है और आपके ही आशीर्वाद से ख़त्म में लेखन में जो सुधार ला रहा हूँ वह आपके आशीर्वाद से ही ला रहा हूँ धन्यवाद आपका भाई अजय कुमार पाण्डेय

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

जी बहुत खूब , आपने तलवार दोनों तरफ चलायी है......सुन्दर समीक्षा बाबाओं की भी और फिल्मकारों की भी ....एक बार फिर यकीं के साथ कहूँगा कि यह आपके द्वारा नहीं लिखा गया है और आप एक बार फिर बोलोगे कि नहो यह मेरी ही शैली है. अनुज मैं एक बात बता देता हूँ कि मैं झूठे को बर्दाश्त कर सकता हूँ अपर झूठ को नहीं...यदि आप अपने में सुधर नहीं लोगे तो मैं किसी भी प्रकार का समर्थन नहीं करूँगा..... यदि आप कहते हो अच्छे बनने की तो अच्छा काम करो. और जिस तुम्हारे अच्छे करने से तुम्हारी निंदा और लोग विरोध करने लगे तो समझ लेना कि तुम अच्छा बन रहे हो. पर जो तुम समझते हो कि अच्छा बनने पर लोग तुम्हे सम्मान देंगे तो गलतफहमी में हो.....अच्छा बनने के लिए बहुत कुच्छ सुनना पड़ता है और यह हमेशा ही मुश्किल भरा और टाइम तकिंग प्रोसेज हैं....पर बुरा बना बहुत ही आसान......तुम अपने घर की दीवारों को देख रहे हो यदि इसे बिगड़ना है तो एक सेकण्ड ही काफी है. लगा दो बम एक पल में तहस-नहस हो जायेगा. परन्तु बनने में वर्षों लग जायेगा और बहुत ही मुश्किल और परिश्रम से बनेगा. उसी प्रकार हमारा जीवन है अनुज......अच्छा बनने के लिए बुरा सहना पड़ता है.......यह मेरा तुम्हे आखिरी सन्देश है क्योंकि मेरे समझाने बाद भी तुम में सुधर नहीं हो रहा है यदि फिर कहीं कोई तुम्हारी ऐसी गलती देखूंगा तो यह तुम्हारे लिए अक्षम्य होगी...और मैं तुमसे बाते करना बंद कर दूंगा ......हाँ मैं कोई महान पुरुष नहीं हूँ कि मैं सामने वाले के अन्दर और बाहर की बात जन लूँ...पर हाँ मैं यह जरुर कहूँगा कि सामने वाला न कहकर भी अपने व्यक्तित्व को मेरे सामने रख देता है......शुभ रात्रि.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: Jayprakash Mishra Jayprakash Mishra

अनुज कितनी बार बोला हूँ की बड़े बनाबे की कोशिश मत करों .....अभी यह तुम्हारा आलेख पढ़कर सभी लोग हंस रहे होंगे.....आपने समस्या जो दिखाया है उसके लिए शुक्रगुजार हूँ.......पर मेरे शैली में लिखना बहुत मुश्किल भाई. आप जाने-अनजाने में कई व्यक्तियों को अपमानित कर दिए हो...किस व्यक्ति का नाम किस तरह इस्तमाल करना है, कहाँ करना है, किन शब्दों से करना है अभी आपको इसकी समझ नहीं. आप अपने विचार जल्दी-जल्दी में पोस्ट करने के चक्कर में अपने आलेख की गुणवत्ता खो बैठते हो. आप किसी दुसरे की शैली की कापी मत करों, आप अपनी शैली में लिखों. लिखने के बाद १०-१२ बार पढों फिर वाक्यों को व्यवस्थित करों. फिर जाकर उसकी पोस्टिंग करों. आप समाज में घटित हो रही समस्याओं को देखों और साहित्यकारों और बुधिजिवियों द्वारा उस पर रखे गए विचारों को पढों. फिर इन दोनों का अपने दिमाग से विश्लेषण करों. परन्तु अंधाधुंध अनुकरण मत करों. सब-कुछ सोच समझकर अपनी बात को अपनी शैली में रखों. किसी भी बिषय पर आलेख लिखते समय पहले उसको परिभाषित करों . उसके बाद लोगो को उससे परिचित कराओं. और अंत में अपना सुझाव रखों सभी लोग आपकी बात को समझ पाएंगे. और दो पोस्टिंग में १० दिन का अन्तराल रखों. आपके लिखने से क्या फायदा की कोई उसे पढ़े ही नहीं. इस लिए लिखने के बाद उसका दुसरे ब्लागेर के पृष्ठ पर जाकर प्रचार करिए....और ऐसा लिखिए की लगे की आप कुछ लिख रहे हो हवा में कलम मत चलाओं. भाई.......

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

अनुज मुझे बिल्कुल पसंद नहीं की कोई मेरी तारीफ़ सामने करें क्योंकि मैं कोई बाबा और स्वामी नहीं हूँ. अपनी ही तारीफ़ लोगो को सामने रखकर सुनता रहूँ. यह काम सिर्फ बेशर्म और अधर्मी बाबाओं का है. पर हाँ मैं यह भी चाह्ताहूँ कि मेरी आलोचना भी सही हो. अब से एक बात और सिख लो. कभी भी किसी व्यक्ति की तारीफ़ उसके सामने नहीं करनी चाहिए और किसी की बुराई दूसरों के सामने नहीं करनी चाहिए. वैसे गुरु और मार्गदर्शक क्या होता है कभी "गुरु" पोस्टिंग करूँगा तो स्पष्ट हो जायेगा. परन्तु उसमे बहुत समय है क्योंकि अभी इसके सिवा कई मुद्दे है जो उससे जरुरी है. रहा सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ तुम्हे लड़ने की तो अभी तुम उस काबिल नहीं हो. पहले अपने पैरों पर खड़े होकर दिखाओं. जब तुम खुद दूसरों पर आश्रित हो तुम क्या लड़ोगे. पाहिले अपनी काबिलियत सिद्ध करों. पढ़ लिखकर एक अच्छा पत्रकार बन जाओं. सैनिक तुम खुद बन जाओगे. हाँ अपने दोस्त के ब्लॉग का लिंक दे दो जरुर पढूंगा.....

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आचार्य जी नमन हमारा लेखन संपर्क कई दिनों से टूट गया है जब हम दोनों मित्र बनते जा रहे थे तब मेने ही ऐसी प्रतिक्रिया देकर आपसे मित्रता ख़तम करनी चाही वो तो मुझे सोचने पर लगा की आप तो नाराज नहीं थे यह जानकर की में पुष्पा जी का बेटा हूँ बल्कि आपने तो मुझे हमेशा प्रतिक्रिया दी है और मेरा हौसला बढाया है अगर आप मेरे से एक बार फिर लेखन संपर्क बना लेंगे तो में अनुग्रहित हूँगा मुझे प्रतिक्रिया रुपी मित्रता दीजिये आचार्य जी में आपसे शमा चाहता हूँ अगर आपको कोई बात अनुचित लगी हो तो कृपया भूल जाए और मेरे प्रतिक्रिया रुपी मित्र बनकर लेखन संपर्क बनाये धन्यवाद आपका शमाशील छात्र अजय पाण्डेय

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

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अनुज अजय, सदैव खुश रहो! तुम्हारी बातों पर कभी हसीं आती हैं तो कभी आश्चर्य होता है. कुला मिला जुलाकर, अपनापन छाप झलकता है और साथ ही एक छोटे भाई की अपने बड़े भाई से उम्मीद भी. वैसे गुरु बहुत उस्ताद हो तुम. एक ही साथ दो बातें कर जाते हो...... भाई भी बोलते हो और खुद को अकेला भी कहते हो........भाई मानने वाली बात नहीं है अनुज, मैं तुम्हारा भाई ही हूँ....अभी तुम्हे बहुत कुछ सिखाना हैं .....क्योंकि बातें तो करते हो बड़ो की तरह पर उससे तुम्हारा बचपना साफ़ झलकता हैं....... यदि सचमुच एक अच्छा पत्रकार बनना चाहते हो तो अधिक से अधिक समय पढाई पर दो और साथ ही अपना विश्लेषण शक्ति मजबूत करो. चूँकि तुम मेरे अनुज हो इसलिए मैं इश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हे ढेर सारी मुश्किलें और कठिनाइयाँ मिले ताकि तुम अपनी योग्यता सिद्ध कर सको ................शुभ आशीर्वाद और प्यार, तुम्हे और तुम्हारे आने वाले कल के लिए.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

अजय भैया, मैं आपकी बातों से समझ नहीं पाया कि आखिर हम दोनों में से बड़ा कौन है......क्योंकि अभीतक मैं यही समझ रहा था कि आप मेरे अनुज हो और मैं आप से बड़ा हूँ. कृपया समाधान करें......यदि आप हमसे बड़े हैं तो जो मैं तुम समझकर संबोधन किया हूँ उसके लिए मांफी चाहूँगा और यदि मैं आप से बड़ा हूँ तो स्पष्ट हैं कि अभी आपको बहुत कुछ सीखना हैं क्योंकि अभीतक आपको यह नहीं पता कि अनुज किसको कहते है और अग्रज किसे कहते हैं. जो शब्द आप सुनते हो वही इस्तमाल कर देते हो .........आपके लेख और विचार में अपरिपक्वता साफ़ झलकता हैं. वैसे भी आप अपना मूल्याकन स्वयं नहीं कर सकते. इस मंच पर एक से बढ़कर लेखक और प्रतिभा पड़े हैं, उनकी तो क़द्र हो ही नहीं पा रही हैं...अभी तो आप को बहुत कुछ सीखना है. हाँ मैं अपनी बात नहीं कर रहा हूँ क्योंकि ....मैं न ही लेखक बनाना चाहता हूँ, न ही कवि न और न ही पत्रकार. परन्तु मुझे जो बनना है, मैं खुद बन जाऊंगा. किसी का मोहताज नहीं हूँ..............बस खुद पर विश्वास करना सिख लो ...उसके मुताबिक काम करों... सब अच्छा होगा .....................पर हाँ इस बात का अभिमान न हो तो ही अच्छा....

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

बहुत अच्छे विचार है अजय. परन्तु उसके लिए तुम्हे अभी बहुत मनन करनी होगी और साथ ही चिंतन और मनन की किस विचारधारा को समर्थन करना है और किस का नहीं. तुम्हारे अन्दर सबसे अच्छी बात यह है कि तुम्हारे अन्दर एक जज्बा है देश के लिए कुछ करने की. यह देशहित और समाजहित क्या होता है, जिस दिन समझने में समर्थ हो जाओगे उस दिन, यही बिचार्धारा तुम्हे महान बनाएगी. परन्तु मेरी बात याद रखना...न तुम्हे महान बनने के लिए काम करना है. न किसी क्षेत्र विशेष के समर्थन के लिए काम करना है और न ही जाई-धर्म विशेष के लिए काम करना है...तुम्हे काम करना होगा मानव हित में, जिवहित में, समाजहित में वो भी वैसा नहीं जैसा ये लोग चाहते हैं बल्कि वैसा काम जो सचमुच सही हो.......यदि जैसा हमारा समाज और दाश चाहता है यदि वही देशहित और समाजहित है तो यह दुनिया ऐसा इस दुनिया का स्वरुप ऐसा नहीं होता जैसा शुरू से लेकर अबतक बना हुआ है .......मैं समझ सकता हूँ कि मेरी बाते अभी तुम्हे समझ में नहीं आ रही होगी उसके लिए ...तुम्हे समाज के हरेक गतविधि पर नज़र रखनी होगी एक सकारात्मक सोच के साथ और उस पर चिंतन और मन करना होगा. और इसप्रक्रिया के दौरान तुम्हे कहीं यह लगने लगे की मेरा तुम्हारा चिंतन और मनन अब ख़त्म हो चूका और तुम्हारा ज्ञान इसलायक हो गया है तुम इस लायक हो चुके हो कि तुम अपनी इच्छा अनुसार दुनिया में बदलाव ला सकते हो तो समझ लेना कि तुम्हारा ज्ञान वही ख़त्म हो गया क्योंकि चिंतन और मनन एक सतत प्रक्रिया है जो कभी ख़त्म नहीं हो सकती. उसके लिए तुम्हे अपना पूरा जीवन उसमे लगाना होगा. मुझे याद रखना या मत रखना परन्तु मेरी यह पहली सिख जरुर याद रखना यदि सचमुच देशहित में काम करना चाहते हो...........हाँ एक बात और कहूँगा कभी किसी जैसा बनने की कोशिश मत करना बस सच का साथ देना और झूठ का विरोध करना. परन्तु सच क्या है और झूठ क्या है.में फर्क ....सिर्फ चिंतन और मनन से ही कर पाओगे क्योंकि यह एक ऐसी चीज है जिसके मायने परस्थिति के अनुसार बदलते रहते है...कभी सच, झूठ हो जाता है,,,,,,तो कभी झूठ, सच........

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

स्नेही योगी जी सही बात कही है आपने की इसमें वोह बात नजर नहीं आई हाँ में अच्छा लेखन करता हूँ पर यह लेखन दिल की बात पर है आपका विचार सही है लेकिन मेरी रचना का कुछ यथार्थ होता है और कुछ मतलब होता है आपका कहना भी सही है लेकिन यह लेखन दिल की बात पर लिखा गया है योगी जी दिल की बात जाफरानी का मतलब है की कैसे दिल बेनूर हो जाता है कैसे दिल में चुभी हुई बात टीस की तरह लगती है और कैसे दिल की बात का बुरा लगता है और यह बात दिल की होती है लेकिन यह बात दिल की होती है और यह बात दिल की होती है और जो बात दिल की है उसकी बात इस लेखन में है बस हमारा एक रचना करने का मकसद है जो दिल की बात है उसे लिखते हैं बस इस रचना का एक यथार्थ है वोह आपको समझने की जरुरत है काश आप इसका यथार्थ समझ पाते तभी आपको इस रचना में बात समझ आती अजय कुमार जी

के द्वारा: ajaykumarji ajaykumarji

श्रीमान जी, समस्त मंत्रियों और नेताओं को -------- लाखो करोड़ के घोटाले का अधिकार भी संविधान देता है. जनता का खून चूसने का अधिकार भी संविधान देता है. महंगाई की चक्की में पिसने का अधिकार भी संविधान देता है. अवैध खनन, अवैध कार्यों का अधिकार भी संविधान देता है. बड़े-बड़े सेक्स स्कैंडल का अधिकार भी संविधान देता है. समस्त सुख भोगने का अधिकार भी संविधान देता है. करोड़ों खर्च कर विदेश में इलाज का अधिकार भी संविधान देता है. जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझने का अधिकार भी संविधान देता है. चिल्लर जैसे पाकिस्तान का तमाचा सहने का अधिकार भी संविधान देता है. परन्तु जनता को क्या देता है ?????????????? आपकी अंतिम लाइन "देशहित में अजय पाण्डेय द्वारा जारी" बेकार है! इसके बदले होना चाहिए ---- "कांग्रेस हित में अजय पाण्डेय द्वारा जारी"

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

आदरणीय अजय जी नमस्कार, मित्र जनता को वास्तविक अधिकार केवल एक ही है वोट देने का, वह भी बिना विकल्प के, प्रत्याशी चुनने के बाद कुछ भी करे, कुछ भी कहे, जनता कुछ नहीं कर सकती तथा न ही कुछ कह सकती है। यदि कह दिया तो संसद की अवमानना का आरोप लग जाता है। नेताओं  को सांसद, विधायक बन जाने के बाद देश को लूटने, जनता का शोषण करने, आमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने आदि अनेक अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। जनता पाँच साल तक पांचाली की तरह  अपना चीर हरण करवाती रहेगी। हमें संविधान में जो अधिकार मिले है वह केवल कागजी हैं। आज के परिवेश में हमारा संविधान खरा नहीं उतरता। जब तक राइट टू रिजेक्ट एवं राइट टू रिकाल का अधिकार हमें नहीं मिलता..... होली की हार्दिक शुभकामनायें...

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik




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